भोजपुरी के सुपर स्टार मनोज तिवारी पर शनिवार की रात झारखंड के गिरिडीह जिले में नक्सलियों ने अटैक कर दिया। गिरिडीह से धनबाद जाने के क्रम में घाटी में एके 47 से लैस लगभग 150 नक्सलाइट्स ने मनोज तिवारी की कार को घेर लिया। अचानक हुए इस नक्सलाइट अटैक में फौरी कार्रवाई करते हुए झारखंड के सुरक्षाकर्मियों ने मनोज को बचाया। लगभग तीन घंटे तक चले इस घटनाक्रम से नक्सलाइट्स ने एक बार फिर से अपनी ताकत का एहसास दिलाया। हालांकि सुरक्षाकर्मियों ने जांबाजी दिखाते हुए किसी अनहोनी को टाल दिया। इस पूरे घटनाक्रम पर हमने मनोज तिवारी से बातचीत की। पेश है मनोज के ही शब्दों में पूरे घटनाक्रम का ब्यौरा..
मैं अपने एक परिचित विनोद सिन्हा के इलेक्शन कैंपेन के लिए शनिवार को गिरिडीह आया था। कैंपेन में हिस्सा लेने के बाद रात 10.15 बजे मैं गिरिडीह से बाई रोड धनबाद के लिए रवाना हुआ। वहां सभी लोग मुझे मना कर रहे थे कि रात में धनबाद जाना सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं होगा। परंतु, रविवार को मुंबई में मेरा प्रोग्राम फिक्स था। महुआ चैनल पर थ्री इडियट्स के प्रोमो के लिए मुझे आमिर खान का इंटरव्यू लेना था। इसलिए रात में रुकना मेरे लिए मुनासिब नहीं था। मैं धनबाद के लिए चल पड़ा।
जैसे ही हमारी गाड़ी गिरिडीह से बाहर निकली, घाटी शुरु हो गई। थोड़ा आगे जाने पर अचानक रास्ते पर रेड कलर के कपड़े की बैरिकेटिंग दिखी। तब तक हमारी गाड़ी वहां पहुंच चुकी थी। हमने अपने ड्राइवर से पूछा कि- यह क्या है? उसने बताया कि हम लोग फंस गये है। यह नक्सलाइट्स की घेराबंदी है। हमारी गाड़ी रुकी ही थी कि बड़ी संख्या में नक्सलाइट्स ने हमें घेर लिया। सभी के हाथ में एके-47 थी। तभी पीरटाड़ थाना के प्रभारी आबिद फोर्स के साथ वहां आ गये। मेरी उनसे पुरानी जान-पहचान है और मैंने उन्हें रास्ते में मिलने के लिए बुलाया था। मैं उन्हें देखते ही गाड़ी से उतरा, पर उन्होंने जल्दी से मुझे गाड़ी में बैठने को कहा।
मैं जैसे ही गाड़ी में बैठा, एके-47 से लैस सुरक्षागार्ड ने अपनी पोजीशन संभाल ली। गाड़ी में बैठे जवानों ने मुझे तुरंत सीट के नीचे झुक जाने को कहा, क्योंकि बाहर फायरिंग शुरू हो चुकी थी। अचानक फोर्स को वहां देख नक्सलाइट्स भी हैरत में पड़ गये। वे भी फायरिंग करने लगे। मैं नीचे झुक गया। हमारे ड्राइवर ने चालाकी दिखाते हुए बैरिकेटिंग तोड़ते हुए गाड़ी को भगाया। यह किसी फिल्म के शूटिंग सा सीन था, पर था रियल।
हमारी गाड़ी भागते हुए आगे पीरटाड़ थाना पहुंची। वहां मुझे गाड़ी से उतार कर सुरक्षा घेरे में ले लिया गया। हम थाना परिसर में थे जरूर, पर वहां भी सबकी आंखों में भय के भाव साफ झलक रहे थे। उनके अफसर इस बात पर नाराज हो रहे थे कि मैं रात में इस खतरनाक सफर पर क्यों निकला? पीरटाड़ थाना भी पूरी तरह से नक्सल प्रभावित एरिया में था और वहां भी किसी समय हमला हो सकता था। पहले भी नक्सली थानों पर अटैक कर उड़ा चुके थे।
मुझे पीरटाड़ थाने से सुरक्षित निकालने के लिए थाना में पूरी प्लानिंग की गई। सिक्योरिटी को यह गुप्त सूचना मिल रही थी कि रास्ते में आगे भी नक्सली घेराबंदी कर रहे हैं। डीएसपी राजेश के नेतृत्व में लगभग 100 जवानों की कंपनी मंगाई गई। लगभग 35 मिनट वहां रुकने के बाद एक बख्तरबंद गाड़ी में मुझे बैठा कर धनबाद का खतरनाक सफर शुरू हुआ। हमारी गाड़ी को एस्कार्ट करते हुए खुद डीएसपी राजेश आगे-आगे चल रहे थे।
सूचना थी कि रास्ते में कहीं भी लैंडमाइंस लगाया जा सकता है। सुनसान रास्तों पर भी जहां कहीं थोड़ा गड्ढा या खुदा दिखता, स्वयं डीएसपी गाड़ी से उतर कर उसको सर्च करने लगते। पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद गाड़ी आगे बढ़ती। इस तरह रात लगभग एक बजे हम सेफली धनबाद पहुंच गये, पर आंखों से नींद गायब थी। पूरा सीन फिल्म की तरह आंखों के सामने चल रहा था। मेरी दोनों मोबाइल बंद हो गई थीं। उन्हें चार्ज किया और तब घर पर सूचना दी कि मैं सेफ हूं।
हमने इस काली रात में देखा कि झारखंड के जवान कैसे काम करते हैं। यहां के जवानों और अफसरों को हर दिन 26-11 झेलना पड़ता है। उनका साहस ही है कि झारखंड में जिंदगी करवटें बदल रही है। अब मैं मां विंध्यवासिनी के दरबार में माथा टेकूंगा।
सौजन्य से -
दैनिक जागरण
भारतीय एकता संगठन परिवार
रामपुर करछना इलाहबाद
बुधवार, 2 दिसंबर 2009
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