ॐ हिंदुओं का सबसे लोकप्रिय मंत्र है। हिंदू ही नहीं, दूसरे संप्रदायों के लिए भी यह एक पवित्र बीजमंत्र है। ओम एकाक्षर ब्रह्म है। इसके एक अक्षर में तीन अक्षर छिपे हुए हैं। ॐ का संक्षेपीकरण संभव नहीं है। क्योंकि यह एक बीज मंत्र है।
बीज मंत्र का आशय है: ऐसा मंत्र जिसे दूसरे शब्दों के साथ जोडने से दूसरे शब्द भी मंत्र बन जाते हैं। अगर श्री गणेशाय नम: में ॐ जोड दिया जाए तो यह एक मंत्र ॐ श्री गणेशाय नम: में तब्दील हो जाता है। किसी भी शब्द को मंत्र बनाने के लिए उसके आगे ॐ जोड दीजिए। लोग यह जानते हैं।
हिंदू धर्म में ईश्वर का पूरा नाम लिखा गया है- ईश्वर प्राणिधान ॐ। इतना लंबा नाम लेकर भगवान को पुकारना संभव नहीं है, इसलिए ईश्वर को संक्षिप्त नाम ॐ से बुलाया जा सकता है। दुनिया भर में इस तरह से नाम रखने की परंपरा है। इसी परंपरा से गुड्डू, बबलू और पप्पू जैसे नाम निकले हैं।
वैसे भी कोई काम शुरू करने से पहले ईश्वर को याद कर लेना चाहिए। यह परंपरा दुनिया भर के धर्मो में है। पश्चिम के धर्मो में ईश्वर से डरने और डराने की परंपरा है- गॉड फिअरिंग।
भारतीय धर्मो में ईश्वर के प्रति प्रेम या भक्ति की परंपरा है। इसलिए भारतीय धर्मो में किसी भी काम को करने के पहले ॐ शब्द का प्रयोग करके ईश्वर को याद किया जा सकता है।
ॐ भारतीयों का प्रथम शब्द भी है। यह शब्द सबसे पहली बार ब्रह्मा के मुख से निकला था। वैसे ब्रह्मा के मुख से सबसे पहले दो शब्द निकले थे- ॐ और अथ। वाणी में ॐ पहला शब्द होता है। लिखने की परंपरा में अथ पहला शब्द है। अगर हम किसी चीज को बोल रहे हैं-जैसे श्री गणेशाय नम: कहना है- तो हमें कहना चाहिए ओम श्री गणेशाय नम:। लेकिन अगर यही वाक्य लिखा जाए तो हम लिखेंगे-अथ श्री गणेशाय नम:। जब मैं किसी की शादी का कार्ड पढता हूं तो उस पर प्राय: लिखा होता है- ॐ श्री गणेशाय नम:। जबकि लिखा होना चाहिए अथ श्री गणेशाय नम:। हमारी संस्कृति में जो कुछ वाचा परंपरा में है, उसका आरंभ ॐ से होता है और जो कुछ लेखनी परंपरा में है, उसका आरंभ अथ से होता है- जैसे अथ रैक्व कथा।
ॐ ऐसा दुर्लभ मंत्र है जिसका प्रयोग भक्ति और ज्ञान समूह के लोग तो करते ही हैं, तंत्र समूह के लोग भी धडल्ले से करते हैं। यह सर्वस्वीकार्य मंत्र है। अध्यात्म में ॐ के कुछ बहुत दुर्लभ प्रयोग किए गए हैं। अगर कोई ध्यान में प्रविष्ट नहीं हो पा रहा है, उसे केवल ॐ से आरंभ कर देना चाहिए। धीरे-धीरे वह ध्यान की गहरी अवस्था में उतरता चला जाएगा। ॐ के बारे में एक रहस्य भरी बात यह है कि इस शब्द की आध्यात्मिकता तब शुरू होती है जब हम इसे बोलना बंद कर देते हैं। जब तक तुम इसे बोलते नजर आओगे, ॐ में कोई आध्यात्मिकता नहीं होगी। लेकिन जैसे ही वाणी को विराम दोगे और इसके बाद भी उसकी आवाज तुम्हारे अंदर सुनाई देने लगे तो समझो यहीं से ॐ की आध्यात्मिकता प्रारंभ हो जाती है। पश्चिम के एक विख्यात इंडोलॉजिस्ट ने ॐ के बारे में रहस्य भरी खोज की थी- ॐ एक टेक्नीक भी है और डेस्टीनेशन भी। यह बात समझनी होगी कि कोई चीज साधन भी हो और साध्य भी। मनुष्य जाति के आध्यात्मिक इतिहास में ऐसे उदाहरण न के बराबर हैं।
लेकिन भारतीय ऋषियों ने टेक्नीक और डेस्टीनेशन को ठीक से समझा था। यहीं से ॐ के ध्यान का तरीका शुरू होता है। तरीका बडा सरल है- पहले कम से कम 10 बार ॐ का उच्चारण करें, फिर एक क्षण के लिए शांत हो जाएं और ॐ को अपने अंदर सुनने का प्रयत्न करें। जो लोग इतनी बात समझ गए होंगे, उन्हें अब यह भी मालूम हो चुका होगा कि जब हम 10 बार ॐ शब्द का उच्चारण करते हैं तो यह टेक्नीक हो जाती है और जैसे ही हम उसे सुनना शुरू करते हैं तो यह डेस्टीनेशन हो जाता है। जब हम बोलते हैं तो ॐ साधन होता है। अब ॐ के ध्यान का आख्िारी लक्ष्य होगा ऐसी स्थिति पैदा कर लेना, जहां हम बोलें नहीं, केवल सुनें..सुनें..और सुनें..।
यह एक दुर्लभ स्थिति होती है। ॐ बोलने का शब्द है ही नहीं, केवल सुनने का शब्द है। लेकिन आरंभ हमेशा बोलने से ही करते हैं। क्योंकि हम केवल वही सुन पाते हैं जो बोल सकते हैं, और हम वही बोल पाते हैं जो सुन सकते हैं। मेरे पास जब भी कोई बच्चा, जो बोल नहीं पाता है, आशीर्वाद के लिए लाया जाता है, मैं उससे एक ही सवाल पूछता हूं-क्या यह बच्चा सुन सकता है।
क्योंकि जो सुन सकता है वही बोल सकता है और जो बोल सकता है वही सुन सकता है। ॐ अनाहत का शब्द है। अनाहत का अर्थ समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि दुनिया में कोई भी आवाज पैदा करने के लिए हवा पर चोट करनी पडती है। हम चांद पर कभी भी बात नहीं कर पाएंगे, क्योंकि चांद पर हवा है ही नहीं। जिन ग्रहों पर हवा नहीं है वहां बात नहीं हो सकती। हवाओं के संपीडन से ही बात होती है। जब हवा नहीं होगी तो हम हवा को आहत नहीं कर पाएंगे-हिटिंग द एयर। लेकिन ॐ की खोज ने पहली बार बताया कि हवा को हिट किए बिना अगर हम उसे अपने अंदर सुनना शुरू कर दें, यही ॐ का सच्चा ध्यान होगा। हिट शब्द को अपनी भाषा में आहत कहेंगे। आहत का उलटा अनाहत होगा। अनाहत से ही अनहद शब्द बना है।
ॐ का ध्यान अनहद-नाद होगा। जैसे ही हम अनहद-नाद तक पहुंचेंगे हमारा लक्ष्य पूरा हो चुका होगा। यही डेस्टीनेशन है। यही ॐ का साध्य भी है। यही आध्यात्मिकता की उच्चतर स्थिति है। कबीर ने ॐ को इन्हीं अर्थो में लिया है- अनहद-नाद। रैदास भी यही कहते हैं और गुरु नानक भी इन्हीं अर्थो में कहते हैं- एक ओंकार सतनाम।
अभी पश्चिम में ब्रह्मांड के बारे में कुछ दुर्लभ खोजें हुई हैं, जिसने ॐ के बारे में नई जानकारियां उपलब्ध कराई हैं। हालांकि अध्यात्म की तुलना विज्ञान से करना बचकानापन है, लेकिन कभी-कभी इस बचकानेपन में भी काम की बातें निकल आती हैं। जिन्होंने कॉस्मोलॉजी पढी होगी उन्हें पता होगा कि आरंभ में जितने सितारे और ग्रह थे वे सभी एक अकेले बडे पिंड के रूप में थे। अचानक उस पिंड में बहुत बडा धमाका हुआ। यह कोई साढे छ: अरब साल पुरानी बात है। हमारे ब्रह्मांड का वह जन्मदिन था। जैसे ही धमाका हुआ वह विशाल पिंड छोटे-छोटे टुकडों में टूटकर पूरे ब्रह्मांड में बिखर गया। उसी से सूरज बना है, हमारी धरती बनी है, चांद बना है, शनि, मंगल, बुध और शुक्र जैसे ग्रह बने हैं। हमारी आकाशगंगा जैसी कई आकाशगंगाए बनी हैं। इस थ्योरी को वैज्ञानिक बिग-बैंग थ्योरी कहते हैं। मैं इसमें ओम के बारे में एक सूत्र की चर्चा करूंगा।
अब जब उस विशाल पिंड में धमाका हुआ होगा तो वहां हवाएं नहीं रही होंगी। जहां हवाएं नहीं होंगी, वहां आवाज भी नहीं हो सकती है।
स्वाभाविक है कि धमाके में जो आवाज हुई होगी-वही ॐ होगा। लेकिन उस शब्द को किसी ने सुना नहीं होगा। यहीं से ऋषियों की संकल्पना है कि ॐ बोलने का नहीं, केवल अनुभव का मामला है। ठीक वैसे ही जैसे विशाल पिंड के टूटने पर आवाज तो हुई होगी, लेकिन किसी ने सुना नहीं होगा। इन्हीं कारणों से ऋषियों ने ॐ शब्द को आहत का न कहकर अनाहत का शब्द कहा। इस तरह ॐ ध्वनि अनहद-नाद की ध्वनि बन गई।
ॐ के बारे में आध्यात्मिकता में फिर कई तरह के प्रयोग किए गए। पहला प्रयोग तो ॐ को ॐ की तरह नहीं बोलना है, इसके लिए इसको तीन अक्षरों में तोड दिया-अ, इ और म्। कुछ लोगों ने इसे अ, उ और म् में भी तोडा है। इसके एक अक्षर में तीन अक्षर समाहित हैं। इसलिए इसे बोलने के लिए तीनों अक्षरों को अलग-अलग और एक साथ बोलना पडता है। ॐ को कभी ओ से नहीं बोलना चाहिए। इसे हमेशा अ से आरंभ करना चाहिए। अ से चलते हुए इ पर आएं और आधा म बोलें। अ हमेशा कंठ से बोला जाता है। इ हमेशा तालु से बोली जाती है और म् हमेशा होंठों से बोला जाता है।
ॐ संपूर्ण ब्रह्मांड का इकलौता ऐसा शब्द है जिसे बोलने में मुंह और कंठ तंत्र की संपूर्णता का इस्तेमाल होता है। कृपया अगर कोई दूसरा ऐसा शब्द हो तो मुझे जरूर बताएं।
प्राय: सुना होगा कि ॐ को बहुत गहरे कंठ या हृदय से निकालना चाहिए। अगर और गहराई में जाना चाहते हो तो उसे नाभि से निकालना चाहिए। अगर तुम और गहराई बढाते चले जाओ तो यह और नीचे से निकलेगा। लेकिन यह तभी संभव है जब तुम ॐ को ओ से न बोलकर अ से बोलना शुरू कर दो। शास्त्रीय संगीत के उस्ताद प्राय: अ को कभी अपने कंठ, कभी हृदय, कभी नाभि, कभी स्वाधिष्ठान और कभी मूलाधार से निकालते हैं। इन्हीं अर्थो में भारतीय शास्त्रीय संगीत आध्यात्मिक संगीत बन जाता है। ॐ को ओ से शुरू करोगे तो उसे कभी भी हृदय या नाभि से नहीं निकाल सकते। यहीं पतंजलि ने आध्यात्मिक ध्यान को प्राप्त करने के लिए अभ्यास और वैराग्य की बात कही है। शायद यही बात शास्त्रीय संगीत के उस्ताद भी कहते हैं- रियाज से संगीत परिपक्व बनता है। लेकिन यह बातें केवल पढकर नहीं सीखी जा सकती हैं। इसके लिए गुरुओं के पास लौटना होगा। इसीलिए ॐ का ध्यान किसी गुरु के निकट बैठकर ही सीखा जा सकता है। यहीं से उपनिषद् की परंपरा शुरू होती है।
शुक्रवार, 6 नवंबर 2009
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